विशेष रिपोर्ट*
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले को 37 दिन बीत चुके हैं, लेकिन जो युद्ध कुछ ही दिनों में ईरान को घुटनों पर लाने के मकसद से शुरू किया गया था, वह अब खुद 'सुपरपावर' अमेरिका के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख इस बात की गवाही दे रहा है। युद्ध की शुरुआत में जो ट्रंप हर दिन ईरानी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की धमकियां दे रहे थे, वे अब हताशा में 'ट्रुथ सोशल' पर ईरान को "अल्लाह से दुआ करने" जैसी तंजिया और अपशब्दों से भरी पोस्ट कर रहे हैं।
इस हताशा के पीछे केवल सैन्य चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि ईरान की वह सोची-समझी कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक बेचैनी बढ़ा दी है।
जंग के 5 सबसे बड़े 'टर्निंग पॉइंट' जिन्होंने अमेरिका को चौंकाया
1. *होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी:* ट्रंप की धमकियों और 48 घंटे के अल्टीमेटम को दरकिनार करते हुए, ईरान ने दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्ग 'होर्मुज' को बंद कर दिया है। कच्चे तेल के दाम आसमान पर हैं और दुनिया गैस-ईंधन संकट से जूझ रही है।
2. *अमेरिकी सहयोगियों पर सीधा प्रहार:* ईरान ने केवल अपना बचाव नहीं किया, बल्कि UAE, ओमान और कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर पलटवार कर यह संदेश दिया कि अमेरिका के सहयोगी भी सुरक्षित नहीं हैं।
3. *हवा में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती:* 3 अप्रैल को अमेरिका के अति-उन्नत F-15E 'स्ट्राइक ईगल' जेट का गिरना और F-35 स्टील्थ फाइटर को निशाना बनाने के ईरानी दावे ने पेंटागन की रातों की नींद उड़ा दी है।
4. *रेस्क्यू मिशन में फजीहत:* गिराए गए फाइटर जेट के 'वेपन्स सिस्टम्स ऑफिसर' को बचाने के लिए अमेरिका को 200 सैनिक और दर्जनों जेट्स झोंकने पड़े। तकनीकी खराबी के कारण अमेरिका को अपने ही दो ट्रांसपोर्ट विमानों को बम से उड़ाना पड़ा ताकि वे ईरान के हाथ न लगें। यह मिशन किसी बड़ी सैन्य नाकामी से कम नहीं था।
5. *शर्तों के साथ युद्धविराम का जाल:* नुकसान पहुँचाने के बाद ईरान ने 'एक्सिओस' की रिपोर्ट के मुताबिक 45 दिन के सीजफायर का प्रस्ताव दिया है। लेकिन इसमें भारी मुआवजे और भविष्य में हमले न होने की गारंटी जैसी कड़ी शर्तें शामिल हैं, जो कूटनीतिक टेबल पर ईरान के पलड़े को भारी दिखाती हैं।
विशेष सामरिक समीक्षा
यह युद्ध केवल मिसाइलों और ड्रोन तक सीमित नहीं है; यह एक नई वैश्विक व्यवस्था की लड़ाई है। इस युद्ध से कई अहम रणनीतिक निष्कर्ष निकलते हैं:
1. ईरान का 'असममित युद्ध' सफल साबित हो रहा है
ईरान जानता है कि वह सीधी सैन्य टक्कर में अमेरिका से नहीं जीत सकता। इसलिए उसने 'आर्थिक युद्ध' का रास्ता चुना। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल गुजरता है। इसे ब्लॉक करके ईरान ने न केवल अमेरिका को, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है। ट्रंप का यह कहना कि "हम वहां से तेल नहीं लाते" जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ने जैसा है, क्योंकि वैश्विक तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर अमेरिकी मुद्रास्फीति (Inflation) पर पड़ रहा है।
2. अमेरिकी सैन्य शक्ति के मिथक का टूटना
F-15E और कथित तौर पर F-35 जैसे विमानों पर मंडराता खतरा यह साबित करता है कि ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम (संभवतः रूस और चीन की परोक्ष मदद से) अब 20 साल पहले वाले इराक या अफगानिस्तान जैसा कमजोर नहीं है। रेस्क्यू मिशन में अमेरिका की फजीहत ने मध्य पूर्व में उसकी ऑपरेशनल कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
3. ट्रंप की 'घरेलू राजनीति' और 'वैश्विक छवि' के बीच टकराव
डोनाल्ड ट्रंप हमेशा "अमेरिका फर्स्ट" (America First) और अमेरिका को विदेशी युद्धों से बाहर निकालने की वकालत करते रहे हैं। लेकिन इजरायल के समर्थन में इस युद्ध में उलझने से उनका अपना ही वोटबैंक और राजनीतिक धड़ा सवाल उठा रहा है। उनकी गालियों और हताशा से भरी सोशल मीडिया पोस्ट्स के कारण विपक्षी नेता उनके मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर सवाल उठा रहे हैं।
4. कूटनीतिक जीत की ओर ईरान?
युद्धविराम का प्रस्ताव देकर ईरान ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। पहला, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिखाना चाहता है कि वह शांति चाहता है। दूसरा, वह जानता है कि लंबे खिंचते युद्ध और होर्मुज ब्लॉक होने से यूरोपीय देश और खुद अमेरिकी जनता बाइडन प्रशासन पर युद्ध रोकने का दबाव बनाएगी। भारी मुआवजे की मांग एक मास्टरस्ट्रोक है, जो अमेरिका को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा करती है।
37 दिन के इस संघर्ष ने साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की सुपीरियरिटी से नहीं जीते जाते। ईरान की भौगोलिक स्थिति (होर्मुज पर नियंत्रण) और प्रॉक्सी युद्ध की क्षमता ने उसे एक अजेय दुश्मन बना दिया है। अमेरिका और इजरायल के लिए अब यह लड़ाई जीतने से ज्यादा "इज़्ज़त बचाने" की कूटनीतिक चुनौती बन गई है।