प्रयागराज में आयोजित Magh Mela 2026 के दौरान मौनी अमावस्या पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। कड़ाके की ठंड और सुबह घने कोहरे के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। संगम तट पर बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक ने नंगे पांव पहुंचकर पवित्र स्नान किया और पुण्य लाभ अर्जित किया।
आस्था की डोर कुछ ऐसी बंधी कि न तो कई किलोमीटर की दूरी ने श्रद्धालुओं को थकाया और न ही उम्र या दिव्यांगता कोई बाधा बनी। सुबह करीब आठ बजे संगम क्षेत्र में कोहरा छाया हुआ था, इसी बीच 88 वर्षीय इंद्राणी देवी अपने बेटे अरुण प्रताप का हाथ थामे संगम नोज की ओर बढ़ती नजर आईं। झुकी कमर और थके चेहरे के बावजूद उनकी जुबान पर सिर्फ एक ही बात थी—“संगम आ गया।” बेटे के अनुसार, जीटी जवाहर चौराहे से पैदल चलकर आने के बावजूद उनका उत्साह देखते ही बनता था, क्योंकि उन्हें हर हाल में स्नान करना था।
मेले में ऐसे ही कई भावुक दृश्य दिखे। बिहार से आए अशोक झा पैदल संगम पहुंचे। उनका कहना था कि संगम की यात्रा चप्पल पहनकर नहीं की जा सकती—यहां की धूल भी उनके लिए प्रसाद समान है। वहीं, दिव्यांग सुनीता लड़खड़ाते कदमों से संगम तक पहुंचीं। उन्होंने कहा कि उनके परिवार की तीन पीढ़ियां हर मौनी अमावस्या पर संगम स्नान करती आई हैं, इसलिए उनका आना जरूरी था।
नंगे पांव यात्रा और अनुशासन की मिसाल
माघ मेला में आस्था के साथ अनुशासन की मिसाल तब देखने को मिली जब बिहार के मोतिहारी से 120 श्रद्धालु बस से प्रयागराज पहुंचे। प्रशासन ने उन्हें नेहरू पार्क स्थित पार्किंग में ठहराया। रविवार सुबह सभी श्रद्धालु नंगे पांव पैदल संगम पहुंचे और सुबह 11 बजे तक विधिवत स्नान कर वापस लौट आए। स्नान के बाद वहीं कपड़े सुखाए गए, पूजा की गई और सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया गया।
मोतिहारी निवासी दीपक यादव, परमेश्वर, मुन्ना सिंह, पवन यादव, प्रभु पटेल और लाल बाबू ने बताया कि गांव के 120 लोग एक ही बस से निकले थे और हर व्यक्ति ने यात्रा के लिए दो-दो हजार रुपये का योगदान दिया। श्रद्धालुओं के अनुसार, उनकी यात्रा का क्रम अयोध्या और चित्रकूट दर्शन के बाद प्रयागराज संगम स्नान का रहा, जिसके बाद उनका अगला पड़ाव काशी होगा। संगम का पवित्र जल साथ लेकर वे गांव लौटेंगे और भगवान शिव को अर्पित करेंगे।
इस समूह की खास पहचान यह रही कि सभी श्रद्धालु भोले बाबा के प्रसाद स्वरूप एक जैसी पगड़ी पहने हुए थे। नंगे पांव, अनुशासित कतारों में चलती उनकी यात्रा माघ मेला में सामूहिकता, समर्पण और आस्था का संदेश देती नजर आई।
घाटों पर खिल उठे चेहरे
मौनी अमावस्या के तीसरे मुख्य स्नान पर्व पर सुबह 8.30 बजे के बाद धूप निकलते ही दशाश्वमेध घाट से लेकर संगम और अन्य घाटों पर श्रद्धालुओं के चेहरे खिल उठे। मौन डुबकी के बाद पुरोहितों से चंदन लगवाया गया और गंगाजल भरा गया। स्नान की ऊर्जा ऐसी थी कि घाटों पर ‘सीताराम’, ‘राम-राम’ और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष गूंजते रहे।
भोर से ही परिवारों और समूहों में पहुंचे श्रद्धालुओं ने स्नान-दान और पूर्वजों के निमित्त जल तर्पण किया। इसके बाद परिजनों और शुभचिंतकों के लिए गंगाजल भरकर संगम से विदा हुए। कुल मिलाकर, Magh Mela 2026 में मौनी अमावस्या का यह स्नान पर्व आस्था, श्रद्धा और परंपरा की जीवंत तस्वीर बनकर सामने आया।